
“वो 1960 का दौर था। तब अधिकतर लड़कियां रात आठ बजे अमीन सयानी का प्रोग्राम सुनने के लिए घर के सभी काम जैसे खाना बनाना, साफ-सफाई करना इत्यादि पहले ही फिनिश कर लिया करती थी। उस वक्त की यादें वो लड़कियां अपनी अगली पीढ़ियों तक साझा करती हैं। ज़ाहिर है, वो सब अब उम्रदराज महिलाएं हो चुकी होंगी। उनके पास अब यादें ही बची होंगी।”
20 फरवरी 2024 को जब भारत के मशहूर रेडियो उदघोषक अमीन सयानी जी का निधन हुआ था तब पत्रकार अर्चना मसीह ने अमीन जी से जुड़ी अपनी कुछ यादें अपने एक लेख में शेयर की थी। ये यादें बहुत दिलचस्प हैं। हमारे कई पाठक, जो उम्रदराज हैं, उन्हें शायद अपने पुराने दिनों में लौटने का मौका मिले।
पसंद आए तो ये यादें ये किस्से आप शेयर अवश्य कीजिएगा। ताकि अधिक से अधिक इस तरह की बातें लोग पढ़ सकें। वैसे ये लेख कुछ दिन पहले भी हमने शेयर किया था। मगर तब इसे फेसबुक ने बहुत सीमित कर दिया था। यानि बहुत अधिक लोगों तक ये लेख नहीं पहुंचा था। काश कि आज पहुंचे। चलिए, लेख पढ़ते हैं।
अर्चना मसीह जी लिखती हैं कि प्रत्येक बुधवार को अमीन सयानी जी का प्रोग्राम बिनाका गीत माला रेडियो पर प्रसारित होता था। अर्चना मसीह जी की मां तब अपनी युवावस्था में थी। उन लोगों के घर में रेडियो नहीं था। लेकिन उनकी एक शादीशुदा बड़ी बहन के घर पर रेडियो था। इसलिए प्रत्येक बुधवार को अर्चना मसीह जी की मां और उनकी अन्य बहनें(यानि अर्चना जी की मौसियां) अपने सख़्त-मिज़ाज पिता से बड़ी बहन के घर जाकर रेडियो पर अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला सुनने की अनुमति मांगती थी। इत्तेफ़ाक से बड़ी बहन का घर भी नज़दीक ही था तो पिता वहां जाने की इजाज़त अपनी बेटियों को दे दिया करते थे।
अर्चना मसीह जी की मां जब अपनी अन्य बहनों संग बड़ी बहन के घर पहुंचती थी तो प्रोग्राम शुरू होने से कुछ मिनट पहले ही उनके जीजा एक ताले वाली अलमारी से रेडियो को बाहर निकालते थे। वो रेडियो लकड़ी के एक कैबिनेट में बंद रहता था। पहले वैसे रेडियो सेट्स भी खूब आते थे। जैसे ही अमीन सयानी जी का प्रोग्राम खत्म होता था, रेडियो को फिर से ताले वाली अलमारी में रख दिया जाता था। सभी लोग बड़ी बेसब्री से बिनाका गीतमाला के पहले नंबर पर आने वाले गीत की घोषणा का इतज़ार करते थे। अमीन सयानी के बोलने का तरीका सबको स्पेशल लगता था।
अमीन सयानी का बिनाका गीत माला प्रोग्राम के इतना ज़्यादा लोकप्रिय होने की सबसे बड़ी वजह ये थी कि वो गीतों के साथ-साथ उन गीतों से जुड़ी रोचक बातें व बिहाइंड द कैमरा के किस्से भी बताया करते थे। ज़ाहिर है, उस वक्त सूचनाएं सिर्फ प्रिंट मीडिया और रेडियो के ज़रिए ही मिलती थी। क्योंकि टीवी की पहुंच भी तब बहुत सीमित थी देश में। इसलिए अमीन सयानी द्वारा अपने खास स्टाइल में बताए गए गीतों से जुड़े-किस्से कहानियां लोगों को बहुत रोचक लगते थे। बहुत अधिक पसंद आते थे।
अर्चना मसीह जी ने अपने पिता और अमीन सयानी के बिनाका गीतमाला प्रोग्राम से जुड़े कुछ किस्सों का ज़िक्र भी अपने लेख में किया है। वो लिखती हैं,”1952-53 की बात है। गांव में उनके पिता के घर पर चार्जेबल बैटरी से चलने वाला एक रेडियो सेट हुआ करता था। उस बैटरी की दिक्कत ये थी कि वो बहुत जल्दी डिस्चार्ज हो जाती थी। और उसे फुल चार्ज होने में 24 घंटे लग जाते थे। इसलिए घर के लोग इस बात का पूरा ध्यान रखते थे कि मंगलवाल की दोपहर तक हर हाल में बैटरी को चार्ज करा लिया जाए। ताकि बुधवार को अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला बिना किसी रुकावट के सुना जा सके।”
बाद में अर्चना जी के पिता जब इलाहबाद यूनिवर्सिटी ग्रेजुएशन करने आए(1950 के दशक मध्य में कभी) तो वो और उनके रूममेट्स पास के एक रेस्टोरेंट में हर बुधवार को अमीन सयानी का प्रोग्राम सुनने जाते थे। ये लोग चाय ऑर्डर करते थे और इतने धीमे-धीमे चाय पीते थे कि जब तक बिनाका गीतमाला चले तब तक उनकी चाय भी खत्म ना हो। क्योंकि चाय खत्म होने पर रेस्टोरेंट का मालिक इनसे कह सकता था कि चलिए, अब जाइए अपने घर वापस।
कुछ दिनों बाद यूनिवर्सिटी की अथॉरिटीज़ ने हॉस्टल के वार्डन के कमरे में एक रेडियो सेट लगवा दिया। वो रेडियो एक एक्सटेंशन कोर्ड के ज़रिए कॉमन रूम में लगे स्पीकर से कनैक्ट कराया गया। ताकि वहां आकर हॉस्टल में रहने वाले सभी स्टूडेंट्स अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सुन सकें। अमीन सयानी की मृत्यु पर अर्चना जी के पिता ने कहा था कि अमीन सयानी मेलोडी के शहंशाह थे। उनकी आवाज़ शांत ज़रूर हो गई हो। लेकिन वो हमारे दिलों में हमेशा एको करती रहेगी। अर्चना जी के पिता की उम्र अब 84 साल है और वो ज्यॉग्राफी के रिटायर्ट प्रोफेसर हैं।
देश में जब टीवी की शुरुआत हुई तो चित्रहार प्रोग्राम के आने के बाद अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला प्रोग्राम अपने पतन की तरफ आने लगा। टीवी के ज़रिए अब गीतों को देखने का ज़रिया भी लोगों के पास था। ज़ाहिर है, चित्रहार प्रोग्राम को बहुत तेज़ी से लोकप्रियता मिली। और बहुत से लोगों ने रेडियो सुनना या तो कम कर दिया, या फिर पूरी तरह से बंद कर दिया। चित्रहार से पहले अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला ही भारत के फिल्म व फिल्मी संगीत के प्रेमियों का इकलौता सूचनाओं का स्रोत था। चित्रहार आने के बाद लोगों के पास विकल्प आ गया। कहना चाहिए कि अधिक बेहतर विकल्प आ गया।
ए.के.तारियानी नाम के एक स्कूल टीचर अर्चना मसीह जी से अमीन सयानी के बिनाका गीतमाला से जुड़ी अपनी एक रोचक याद शेयर करते हुए बताते हैं,”हमारा बोर्डिंग स्कूल एक दूर-दराज इलाके में था। मेरे रूममेट के पास एक पॉकेट रेडियो हुआ करता था। हम दोनों बहुत सीक्रेटली अमीन सयानी का प्रोग्राम सुनते थे। लेकिन एक दिन स्कूल सूप्रीटेंडेंट ने हमें पकड़ लिया। हमें सख़्त सज़ा दी गई थी। मगर हम इतने ज़्यादा एडिक्टेड हो चुके थे उस प्रोग्राम के कि आखिरकार एक नोटिस जारी किया गया और हमसे कहा गया कि हम कॉमन रूम में अन्य स्टूडेंट्स व टीचर्स के साथ रेडियो पर अमीन सयानी का प्रोग्राम सुन सकते हैं।” #rememberingameensayani #ameensayani #RIPAmeenSayani
