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सुषमा सेठ: उस दौर की बेटी जिसने परंपराओं की दीवारें तोड़कर अपना रास्ता बनाया

  • June 22, 2026

भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पिछले कुछ दशकों में काफी बदली है। आज लड़कियां विदेशों में पढ़ाई करती हैं, बड़े-बड़े पदों पर काम करती हैं और अपने फैसले खुद लेने लगी हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब समाज की सोच बिल्कुल अलग थी। उस दौर में बहुत-सी लड़कियों को घर की चारदीवारी से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं मिलती थी। उच्च शिक्षा तो दूर की बात थी, कई परिवारों में लड़कियों की पढ़ाई भी जल्दी छुड़वा दी जाती थी।

ऐसे समय में एक युवती ने न केवल अपने सपनों को देखने की हिम्मत की, बल्कि उन्हें पूरा भी किया। वह युवती थीं सुषमा सेठ।

आज सुषमा सेठ भारतीय फिल्म और टेलीविजन जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने लंबे करियर में मां, दादी और परिवार की मुखिया जैसे कई यादगार किरदार निभाए हैं। लेकिन उनकी असली कहानी सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं है। उनकी जिंदगी भारतीय महिलाओं के बदलते स्वरूप और संघर्ष की भी कहानी है।

20 जून 1936 को दिल्ली में जन्मी सुषमा सेठ ऐसे परिवार में पैदा हुई थीं, जहां शिक्षा और प्रगतिशील सोच को महत्व दिया जाता था। यह वह समय था जब भारत में अधिकांश परिवार पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार जीवन जीते थे। लड़कियों की स्वतंत्रता सीमित थी और विदेश जाकर पढ़ाई करना तो लगभग असंभव माना जाता था।

जब अमेरिका जाने का फैसला लोगों के लिए हैरानी बन गया

आज किसी छात्र का विदेश पढ़ने जाना सामान्य बात लग सकती है। लेकिन 1950 और 1960 के दशक में स्थिति बिल्कुल अलग थी।

जब सुषमा सेठ अमेरिका में पढ़ाई के लिए जाने वाली थीं, तब उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों को इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था। लोगों के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि एक भारतीय परिवार अपनी युवा बेटी को अकेले हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका भेज सकता है।

कई लोगों ने उनके पिता को समझाने की कोशिश की। उनका कहना था कि बेटी अब जवान हो चुकी है, इसलिए उसकी शादी कर देनी चाहिए। विदेश भेजना उचित नहीं होगा।

लेकिन सुषमा सेठ के पिता ने समाज की इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने अपनी बेटी के सपनों को महत्व दिया और उसे पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजने का निर्णय लिया।

यह फैसला उस समय के हिसाब से बेहद साहसिक था।

अमेरिका में मिला अभिनय का रास्ता

अमेरिका पहुंचने के बाद सुषमा सेठ की जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया।

पढ़ाई के दौरान उनकी रुचि नाटकों और रंगमंच की ओर बढ़ने लगी। उन्होंने वहां कई ड्रामा प्रस्तुतियों में हिस्सा लिया। धीरे-धीरे थिएटर उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

अमेरिका में उन्होंने केवल अभिनय ही नहीं सीखा, बल्कि थिएटर की पूरी प्रक्रिया को समझा। उन्होंने जाना कि एक नाटक कैसे तैयार किया जाता है, उसकी पटकथा कैसे लिखी जाती है, कलाकारों का चयन कैसे होता है और मंचन से पहले किन-किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है।

यह अनुभव उनके भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

वहां बिताए गए वर्षों ने उनकी सोच को व्यापक बनाया और उन्हें एक नई पहचान दी।

भारत वापसी और थिएटर के प्रति समर्पण

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सुषमा सेठ भारत लौट आईं।

लेकिन अब वह पहले वाली युवती नहीं थीं। अमेरिका का अनुभव उन्हें एक नई दृष्टि दे चुका था।

भारत लौटने के बाद उन्होंने थिएटर की दुनिया में सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। उनका उद्देश्य सिर्फ अभिनय करना नहीं था, बल्कि भारतीय रंगमंच को बेहतर बनाना भी था।

दिल्ली में उस समय थिएटर गतिविधियां तो थीं, लेकिन उन्हें अधिक संगठित और पेशेवर बनाने की जरूरत महसूस की जा रही थी।

इसी सोच के साथ सुषमा सेठ ने कुछ प्रमुख रंगकर्मियों के साथ मिलकर एक थिएटर समूह की स्थापना की।

इस समूह का नाम रखा गया — यात्रिक

यात्रिक: भारतीय रंगमंच का महत्वपूर्ण अध्याय

यात्रिक थिएटर ग्रुप दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित थिएटर समूहों में से एक माना जाता है।

इस संस्था ने भारतीय रंगमंच को कई प्रतिभाशाली कलाकार दिए। सुषमा सेठ ने इसके माध्यम से न केवल अभिनय किया बल्कि नए कलाकारों को मंच भी उपलब्ध कराया।

रंगमंच के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें थिएटर जगत में विशेष पहचान दिलाई।

आज भी जब दिल्ली के थिएटर इतिहास की बात होती है तो यात्रिक का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

देर से शुरू हुआ अभिनय करियर

सिनेमा की दुनिया में अक्सर कलाकार बहुत कम उम्र में प्रवेश करते हैं। कई अभिनेत्रियां 20 से 25 वर्ष की उम्र में स्टार बन जाती हैं।

लेकिन सुषमा सेठ का सफर बिल्कुल अलग था।

उन्होंने उस उम्र में फिल्मों और टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा जब कई अभिनेत्रियां अपना करियर समाप्त कर गृहस्थ जीवन में व्यस्त हो जाती हैं।

यही कारण है कि उनका करियर भारतीय मनोरंजन उद्योग में एक अनोखी मिसाल माना जाता है।

उन्होंने यह साबित किया कि सफलता पाने की कोई निर्धारित उम्र नहीं होती।

फिल्मों में यादगार पहचान

सुषमा सेठ ने अनेक फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

हालांकि वे पारंपरिक अर्थों में मुख्य नायिका नहीं रहीं, लेकिन उनके निभाए गए चरित्र दर्शकों के दिलों में बस गए।

1980 और 1990 के दशक की कई लोकप्रिय फिल्मों में उन्होंने मां, दादी या परिवार की वरिष्ठ सदस्य के रूप में प्रभावशाली अभिनय किया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके किरदार कृत्रिम नहीं लगते थे। स्क्रीन पर उन्हें देखकर ऐसा महसूस होता था जैसे वे वास्तव में उसी परिवार का हिस्सा हों।

उनकी संवाद अदायगी, भाव-भंगिमाएं और स्वाभाविक अभिनय उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाता था।

टेलीविजन पर भी मिली अपार सफलता

जब भारत में टेलीविजन का विस्तार होने लगा तो सुषमा सेठ ने इस माध्यम में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

उन्होंने कई लोकप्रिय धारावाहिकों में काम किया और घर-घर में पहचानी जाने लगीं।

उनके निभाए गए बुजुर्ग महिला पात्र दर्शकों को बेहद पसंद आते थे।

वह केवल अभिनय नहीं करती थीं, बल्कि अपने किरदारों में जीवन भर देती थीं।

यही कारण है कि नई पीढ़ी के दर्शक भी उन्हें पहचानते हैं, भले ही उन्होंने उनके शुरुआती थिएटर या फिल्मी सफर को न देखा हो।

महिलाओं के लिए प्रेरणा

सुषमा सेठ की कहानी केवल एक अभिनेत्री की कहानी नहीं है।

यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने उस समय अपने सपनों को पूरा करने का साहस दिखाया जब समाज महिलाओं की स्वतंत्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।

उन्होंने यह साबित किया कि शिक्षा और आत्मविश्वास किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

अगर उनके पिता समाज की बातों में आ जाते और उन्हें अमेरिका न भेजते, तो शायद भारतीय रंगमंच और सिनेमा एक महत्वपूर्ण कलाकार से वंचित रह जाता।

उनकी कहानी आज भी उन परिवारों के लिए प्रेरणा है जो अपनी बेटियों को बड़े सपने देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

सुषमा सेठ की विरासत

आज जब हम सुषमा सेठ के जीवन को देखते हैं तो महसूस होता है कि उन्होंने केवल अभिनय नहीं किया, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर सोच बदलने में भी योगदान दिया।

उन्होंने अपने काम, व्यक्तित्व और उपलब्धियों से यह संदेश दिया कि अवसर मिलने पर महिलाएं किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं।

उनका जीवन संघर्ष, शिक्षा, कला और आत्मनिर्भरता का सुंदर उदाहरण है।

जन्मदिन पर विशेष सम्मान

20 जून 1936 को जन्मी सुषमा सेठ आज भारतीय मनोरंजन जगत की उन हस्तियों में गिनी जाती हैं जिनका योगदान लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

उन्होंने रंगमंच, टेलीविजन और सिनेमा तीनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई।

उनकी उपलब्धियां केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका का भी प्रतीक हैं।

आज उनके जन्मदिन के अवसर पर उन्हें याद करना और उनके जीवन से प्रेरणा लेना सबसे बड़ा सम्मान है।

किस्सा टीवी की ओर से वरिष्ठ अभिनेत्री सुषमा सेठ जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। उनका जीवन और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहे, यही कामना है।


Disclaimer

यह लेख उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों, सार्वजनिक जानकारी और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। लेख का उद्देश्य सुषमा सेठ के जीवन, रंगमंच और अभिनय यात्रा को सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करना है। किसी भी ऐतिहासिक या जीवनी संबंधी तथ्य के लिए आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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