
हिंदी सिनेमा के इतिहास में अगर किसी अभिनेता ने खलनायक की भूमिका को नई पहचान दी, तो वह थे प्राण। अपने लंबे फिल्मी करियर में उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में काम किया और अपने अभिनय से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके शुरुआती दिनों में एक पत्रकार दोस्त ने उनके करियर को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी।
लाहौर फिल्म इंडस्ट्री का दौर
यह कहानी उस समय की है जब भारत का विभाजन नहीं हुआ था और लाहौर फिल्म निर्माण का एक बड़ा केंद्र माना जाता था। उस दौर में प्राण धीरे-धीरे लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बना रहे थे। उनके अभिनय की चर्चा होने लगी थी और नए-नए लोगों से उनकी दोस्ती भी बढ़ रही थी।
इन्हीं दोस्तों में एक नाम था वी एन नैयर का। वे लाहौर के एक सक्रिय फिल्म पत्रकार थे और उन्होंने 1940 में एक मासिक अख़बार शुरू किया था, जिसका नाम था “The Critic”। यह अख़बार फिल्म जगत की खबरों और समीक्षाओं के लिए जाना जाता था।
फिल्मी दुनिया में मजबूत संपर्क
वी.एन. नैयर की रणनीति साफ थी। अपने अख़बार को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के बड़े लोगों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी थी। उनके संपर्कों में कई महत्वपूर्ण नाम शामिल थे।
इनमें लेखक वली मोहम्मद वली, उनकी पत्नी और अभिनेत्री मुमताज शांति, तथा पंचोली आर्ट पिक्चर्स के मालिक दलसुख पंचोली भी शामिल थे।
दिलचस्प बात यह है कि वली मोहम्मद वली वही व्यक्ति थे जिन्होंने प्राण को फिल्मी दुनिया में आने के लिए प्रेरित किया था। इसी वजह से उनकी पहचान वी.एन. नैयर से भी हुई और धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए।
एक डॉक्टर जिसने बनाई फिल्म
वी.एन. नैयर का एक और दोस्त था — आनंद प्रकाश पारकर, जो पेशे से डॉक्टर थे। वे एक ऐसी दवा बेचते थे जो उस समय बेहद लोकप्रिय थी और जिसकी वजह से उन्हें काफी आर्थिक सफलता मिली थी। कहा जाता है कि उस दौर में उनकी मासिक कमाई 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच जाती थी, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी।
डॉक्टर पारकर को फिल्मों में भी दिलचस्पी थी। जब वी.एन. नैयर ने उन्हें फिल्म निर्माण करने की सलाह दी, तो उन्होंने बिना ज्यादा सोचे इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
हीरो के रूप में प्राण का चयन
फिल्म निर्माण का अनुभव डॉक्टर पारकर के पास नहीं था। इसलिए उन्होंने पूरी जिम्मेदारी वी.एन. नैयर को सौंप दी। जब बात फिल्म के हीरो की आई, तो नैयर ने तुरंत प्राण का नाम सुझाया।
उन्होंने डॉक्टर पारकर को बताया कि प्राण पहले भी कुछ फिल्मों में काम कर चुके हैं और उनका व्यक्तित्व स्क्रीन पर प्रभावशाली लगता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि प्राण उनके दोस्त हैं, इसलिए उनके साथ काम करना आसान रहेगा।
आखिरकार डॉक्टर पारकर द्वारा निर्मित फिल्म परदेसी बालम में प्राण को बतौर हीरो कास्ट किया गया। यह फिल्म 1945 में रिलीज़ हुई थी।
फिल्म की जानकारी लगभग खो चुकी है
दुर्भाग्य से आज इस फिल्म के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। यह स्पष्ट नहीं है कि फिल्म में प्राण के अलावा किन कलाकारों ने काम किया था या इसका निर्देशन किसने किया था। पुराने समय की कई फिल्मों की तरह इसकी जानकारी भी इतिहास के पन्नों में लगभग खो चुकी है।
पहली कार की कहानी
सालों बाद वी.एन. नैयर ने एक इंटरव्यू में इस फिल्म को याद करते हुए बताया कि परदेसी बालम से हुई कमाई से ही प्राण ने अपनी ज़िंदगी की पहली कार खरीदी थी।
हालांकि यह जानकारी किसी को नहीं रही कि वह कार किस कंपनी की थी या कौन सा मॉडल था। न तो वी.एन. नैयर को यह याद था और न ही बाद के वर्षों में प्राण को।
लेकिन इतना जरूर कहा जाता है कि उस दौर में लाहौर में प्राण अपनी शानदार जीवनशैली के लिए जाने जाते थे। इसलिए यह मानना मुश्किल नहीं कि उनकी पहली कार भी किसी खास और प्रतिष्ठित कंपनी की रही होगी।
एक छोटी फिल्म, बड़ा असर
भले ही परदेसी बालम आज इतिहास में ज्यादा दर्ज नहीं है, लेकिन इस फिल्म ने प्राण के करियर में एक अहम भूमिका निभाई। आगे चलकर उन्होंने हिंदी सिनेमा में खलनायक की ऐसी छवि बनाई जो दशकों तक याद की जाती रही।
उनकी कहानी यह साबित करती है कि कभी-कभी एक दोस्त की सलाह और सही मौके से पूरी जिंदगी की दिशा बदल सकती है।
