
🌿 Khayyam Birth Anniversary: जिनकी धुनों में शायरी सांस लेती थी
“ऐ दिल-ए-नादान… आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है”
यह पंक्तियां सिर्फ़ गीत नहीं, बल्कि एहसास हैं।
फ़िल्म Razia Sultan का यह गीत आज भी सुनने वाले को ठहरने पर मजबूर कर देता है।
इस कालजयी रचना के पीछे थे — खय्याम साहब।
🎼 लता मंगेशकर की पसंदीदा धुनें
एक इंटरव्यू में लता मंगेशकर ने इस गीत को अपने most favourite songs में गिना था।
उन्होंने खय्याम साहब के बारे में कहा था कि—
उनकी धुनों में शायरी की आत्मा बसती थी।
पत्रकार Subhash K. Jha से बातचीत में लता जी ने बताया था कि जब खय्याम साहब बीमार थे, तो वह नियमित रूप से उनकी सेहत के बारे में फोन कर जानकारी लिया करती थीं।
🎂 खय्याम साहब का जन्म और व्यक्तित्व
18 फ़रवरी 1927 को जन्मे
मोहम्मद ज़हूर खय्याम
सिर्फ़ संगीतकार नहीं, बल्कि एक उसूलों वाले इंसान थे।
बेहद सॉफ्ट-स्पोकन आत्मसम्मान से समझौता न करने वाले काम के लिए कभी सिफ़ारिश या विनती नहीं की
यही वजह रही कि उनकी प्रतिभा के अनुरूप उन्हें कभी पर्याप्त काम नहीं मिला।
🎶 पहली मुलाक़ात: ‘शोला और शबनम’
लता मंगेशकर ने पहली बार खय्याम साहब के निर्देशन में
फ़िल्म ‘शोला और शबनम’ का गीत
“जीत ही लेंगे बाज़ी हम” गाया था।
लता जी उस धुन से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने खुद पूछा—
“आपने यह धुन सोची कैसे?”
📜 शायरी से गहरा रिश्ता
खय्याम साहब का शायरी प्रेम अद्भुत था।
एक बार वे लता जी के लिए
मीर तकी मीर की लगभग 200 साल पुरानी शायरी लेकर आए
और उसे सही भाव के साथ गवाने के लिए लंबा रियाज़ करवाया।
उनकी धुनें सिर्फ़ संगीत नहीं थीं —
वे अदब और तहज़ीब की विरासत थीं।
💔 निजी जीवन और अंतिम विदाई
खय्याम साहब का देहांत
19 अगस्त 2019 को हुआ।
उनकी पत्नी Jagjit Kaur — जो स्वयं एक गायिका थीं —
का निधन उनसे दो साल बाद
15 अगस्त 2021 को हुआ।
लता जी ने कहा था कि
सज्जाद हुसैन और खय्याम — ये दो संगीतकार थे जिन्हें उनका हक़ कभी पूरा नहीं मिला।
🌸 निष्कर्ष: खामोश महानता
खय्याम साहब उन कलाकारों में थे जो शोर नहीं करते थे,
लेकिन जिनकी धुनें सदियों तक बोलती हैं। आज उनकी जन्मतिथि पर उन्हें नमन करना हिंदी सिनेमा की आत्मा को नमन करना है।
