
उस गधे को कौन मनाएगा एक्टिंग करने के लिए? तुम मना सकोगे क्या?
यह बात कहते हुए शशधर मुखर्जी अपनी हँसी रोक नहीं पा रहे थे। सामने खड़े थे उनके भतीजे राम मुखर्जी। बात हो रही थी एक ऐसे लड़के की, जिसे फिल्मों में आने का दूर-दूर तक कोई शौक नहीं था—और वही लड़का आगे चलकर हिंदी सिनेमा का लोकप्रिय हीरो बना। यह किस्सा है जॉय मुखर्जी के फिल्मों में आने का।
आज यह कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि जॉय मुखर्जी साहब का जन्म 24 फ़रवरी 1939 को हुआ था। आइए, इस दिलचस्प सफ़र को बिल्कुल शुरुआत से समझते हैं।
फिल्मों से दूर रहने वाला स्टार
जॉय मुखर्जी का बचपन और युवावस्था फिल्मों के माहौल में बीते, लेकिन इसके बावजूद अभिनय में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे खेलकूद के शौकीन थे—खासतौर पर टेनिस। कुश्ती में भी उनकी रुचि थी। पढ़ाई के दिनों में वे खुद को एक खिलाड़ी के रूप में देखते थे, न कि अभिनेता के तौर पर।
हालाँकि उनके पिता शशधर मुखर्जी उस दौर के फिल्म उद्योग का एक बड़ा नाम थे। बड़े-बड़े कलाकार, निर्देशक और तकनीशियन उनके स्टूडियो में आते-जाते रहते थे। लेकिन जॉय के लिए यह सब सिर्फ़ पारिवारिक पृष्ठभूमि थी, कोई सपना नहीं।
‘हम हिंदुस्तानी’ और एक संयोग
उसी समय शशधर मुखर्जी फिल्म हम हिंदुस्तानी की तैयारी कर रहे थे। यह दो भाइयों की कहानी थी। बड़े भाई के किरदार के लिए सुनील दत्त को लगभग फाइनल कर लिया गया था, लेकिन छोटे भाई के रोल के लिए अब तक कोई अभिनेता तय नहीं हो पाया था।
उन दिनों जॉय मुखर्जी सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में पढ़ रहे थे। एक दिन वे यूँ ही अपने पिता के स्टूडियो पहुँच गए। उसी वक्त राम मुखर्जी कलाकारों का स्क्रीन टेस्ट ले रहे थे।
जॉय को देखते ही स्टूडियो में मौजूद कुछ लोग चौंक गए। लंबा कद, सधी हुई बॉडी, आकर्षक चेहरा—और उस पर छोटे-छोटे बाल, क्योंकि उन्होंने NCC जॉइन कर रखी थी। अचानक कुछ लोगों को भ्रम हो गया कि स्टूडियो में सुनील दत्त आ गए हैं।
“सुनील दत्त आ गए… सुनील दत्त!”
ऐसी आवाज़ें गूंजने लगीं।
राम मुखर्जी को आया आइडिया
यह पूरा दृश्य राम मुखर्जी ने देखा। उन्होंने तुरंत शशधर मुखर्जी से बात की और बताया कि पहले भी एक-दो बार लोग जॉय को सुनील दत्त समझ चुके हैं। फिर उन्होंने सुझाव रखा—
“इतने टेस्ट के बाद भी दूसरा भाई नहीं मिला है। क्यों न यह रोल जॉय से ही करवा लिया जाए? फ़िल्म के लिए भी सही रहेगा।”
यह सुनकर शशधर मुखर्जी ज़ोर से हँस पड़े। वही मशहूर वाक्य यहीं कहा गया—
“उस गधे को कौन मनाएगा एक्टिंग करने के लिए?”
आदेश, आँसू और चुप्पी
इसके बावजूद पिता और चाचा दोनों जॉय के पास पहुँचे। जॉय उस समय किताब पढ़ रहे थे। शशधर मुखर्जी ने आदेश देने वाले लहजे में कहा—
“तुम्हें ‘हम हिंदुस्तानी’ में काम करना है।”
उस दौर में पिता की बात टालना आसान नहीं था। जॉय कुछ बोले नहीं, लेकिन भीतर ही भीतर टूट गए। उन्हें अभिनय नहीं करना था। नतीजा यह हुआ कि वे रो पड़े।
करीब एक घंटे तक वे रोते रहे। यह दृश्य शशधर मुखर्जी के लिए भी असहज था और वे वहाँ से चले गए।
दो सौ रुपये की पेशकश
कुछ देर बाद राम मुखर्जी वापस आए। उन्होंने माहौल हल्का करने की कोशिश की और जॉय से पूछा—
“तुम्हें पॉकेट मनी कितनी मिलती है?”
जॉय ने बताया—पंद्रह रुपये।
राम मुखर्जी मुस्कुराए और बोले—
“अगर मैं तुम्हें महीने के दो सौ रुपये दूँ, तो क्या तुम मेरी फिल्म करोगे?”
उस समय दो सौ रुपये बहुत बड़ी रकम थी। जॉय हैरान भी हुए और खुश भी। उन्होंने मज़ाक में कहा—
“इतने पैसों में तो मैं स्टूडियो में झाड़ू भी लगा दूँ!”
एक अनिच्छुक शुरुआत, एक बड़ा करियर
और इसी तरह, महज़ दो सौ रुपये महीने की तनख़्वाह पर जॉय मुखर्जी ने अपनी पहली फिल्म साइन कर ली। यह शुरुआत मजबूरी में हुई थी, लेकिन आगे चलकर यही मजबूरी उनका करियर बन गई।
यह पूरा किस्सा जॉय मुखर्जी साहब ने रेडियो होस्ट RJ अनमोल के साथ हुई एक बातचीत में खुद सुनाया था।
एक और रोचक तथ्य—अक्सर विकिपीडिया पर लिखा मिलता है कि जॉय मुखर्जी का जन्म झांसी में हुआ था, जबकि सच्चाई यह है कि उनका जन्म, पढ़ाई और परवरिश मुंबई में ही हुई।
आज उनके जन्मदिन पर, यह कहानी याद दिलाती है कि कभी-कभी जो रास्ता हम चुनते नहीं, वही हमें हमारी पहचान दे जाता है।
जॉय मुखर्जी साहब को किस्सा टीवी की ओर से सादर नमन।
