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दादामुनि अशोक कुमार के बारे में मीना कुमारी जी ने ये बातें एक दफ़ा एक रेडियो इंटरव्यू में कही थी। आज मीना जी की डेथ एनिवर्सरी है। साल 1972 में आज ही के दिन मीना जी का देहांत हुआ था।

  • March 31, 2026

“वैसे तो अशोक साहब बड़े रौब और दबदबे वाले इंसान हैं। मगर हक़ीक़त में उनके मिज़ाज में संजीदगी कम ही है। मैं उनकी शान में कोई गुस्ताख़ी नहीं करूंगी। क्योंकि मैं उन्हें अपना उस्ताद मानती हूं। अपनी फ़िल्मी ज़िंदगी में मैंने जो कुछ भी सीखा है, वो ज़्यादातर उन्हीं से सीखा है। मैं उनकी उस ज़माने से फ़ैन हूं जब मुझे ये भी नहीं मालूम था कि फ़ैन कहते किसे हैं।”

दादामुनि अशोक कुमार के बारे में मीना कुमारी जी ने ये बातें एक दफ़ा एक रेडियो इंटरव्यू में कही थी। आज मीना जी की डेथ एनिवर्सरी है। साल 1972 में आज ही के दिन मीना जी का देहांत हुआ था। मीना जी ने उस इंटरव्यू में लता जी व दिलीप साहब के बारे में भी बात की थी। मीना जी को नमन करते हुए, चलिए वो भी जानते हैं।

“लता मंगेशकर। बेहतरीन गायिका का खिताब मिलने पर उन्होंने जो दरख़वास्त की है, वो आपने भी सुनी होगी ना? यही कि अब आईंदा मुझे ये ईनाम ना दिया जाए। बल्कि उन नए कलाकारों को दिया जाए जिनका ये हक़ है। उन्होंने हौंसला बढ़ाने को हक़ कहकर कितनी बड़ी बात कही है। जैसे किसी शहंशाह ने किसी अनजाने, बिना ताज के बादशाह को पहचानकर, उसके लिए अपना तख़्त छोड़ दिया हो।”

“दिलीप साहब के साथ मैं कोई तीन-चार फ़िल्मों में काम किया है। मगर उनके साथ किसी संजीदा फ़िल्म में काम करने की हसरत ही रह गई। और ये शिकायत मुझे आज भी है। एक फ़िल्म थी अमर, जिसमें बदकिस्मती से मैं उनके साथ काम नहीं कर सकी। दूसरी फ़िल्म थी फ़ुटपाथ, जो मैंने खुद भी नहीं देखी। तीसरी फ़िल्म थी यहूदी, जो कोई खास जगह हासिल नहीं कर सकी। अब रह गई आज़ाद और कोहीनूर। दोनों कामयाब फ़िल्में थी।”

“मगर जैसा कि आप जानते हैं, दोनों ही कॉमेडी फ़िल्में थी। इन फ़िल्मों में काम करते वक्त दिलीप साहब की शख़्सियत का एक ख़ास रूप जो मेरे सामने आया, वो ये था कि उनके किरदार में सिर्फ़ संजीदगी ही नहीं, बल्कि गज़ब का कॉन्फ़िडेंस भी है। और उनका ये कॉन्फ़िडेंस, कठिन से कठिन हालात में भी ना सिर्फ़ उन्हें सहारा देता है, बल्कि उनके साथ काम करने वाले दूसरे लोगों का हौंसला भी बढ़ाता है।”

“फ़िल्म आज़ाद की शूटिंग का एक वाकया सुनाऊं आपको? ऊटी और कोयम्बटूर के बीच में एक रोपवे है। जिस पर ट्रॉली की मदद से सामान ले जाया जाता है। फ़िल्म का एक सीन था जिसमें दिलीप साहब मुझे शहर से दूर, डाकुओं की गुफ़ाओं में ले जाते हैं। हम दोनों को एक ट्रॉली पर बैठकर वहां तक पहुंचना था। इसलिए एक ट्रॉली पर मैं और दिलीप साहब बैठ गए। और दूसरी ट्रॉली पर कैमरामैन बैठ गए।”

“सफ़र शुरू हुआ। मगर जब हम लोग कोई तीन-चार सौ फ़ीट की ऊंचाई पर पहुंचे, तो मेरा तो सिर चकराने लगा। और दो ट्रॉलियों के वज़न से रोपवे भी झूलने लगी। वो झोल इतना ज़्यादा बढ़ा कि हमारी ट्रॉली और ज़मीन के बीच मुश्किल से एक फ़ीट का फ़ासला रह गया होगा। ये सोचकर मेरे हाथ-पांव फ़ूल गए कि अगर ट्रॉली ज़मीन से टकराकर उछल गई तो क्या होगा?”

“मेरी सांस रुकने लगी। हलक सूख गया। मगर दिलीप साहब तो दिलीप साहब हैं। थोड़ी देर के लिए घबराहट तो उन्हें भी हुई थी। मगर उनके कॉन्फ़िडेंस में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने मेरा हाथ थामकर मुझे तसल्ली दी। मेरा हौंसला बढ़ाया। हाथ उनका भी बर्फ़ की तरह ठंडा था। मगर मुझे कुछ इत्मिनान ज़रूर हो गया। और फिर जो कुछ भी हुआ, वो तो आपने आज़ाद के उस सीन में देखा ही होगा।” #meenakumari #LataMangeshkar #AshokKumar #DilipKumar

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