
भारतीय सिनेमा में जब भी सामाजिक यथार्थ, राजनीति और स्त्री-विमर्श की बात होती है, तो प्रकाश झा का नाम अपने आप सामने आ जाता है। उन्होंने हमेशा सिनेमा को सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज से सवाल पूछने वाला एक सशक्त औज़ार समझा। उनकी फिल्म मृत्युदंड इसी सोच का सबसे सशक्त उदाहरण है।
एक पुराने इंटरव्यू में प्रकाश झा ने कहा था कि वह यह जानकर सिहर गए थे कि कैसे कुछ जगहों पर पंचायतें अपनी ही कम्युनिटी की औरतों पर अत्याचार को “सज़ा” का रूप दे देती हैं। उनके लिए यह सिर्फ़ एक घटना नहीं थी, बल्कि पूरे समाज की बीमार मानसिकता का प्रतीक थी—जहां औरत की इच्छा, उसका शरीर और उसका जीवन पुरुषों के नियंत्रण में माना जाता है।
मृत्युदंड: सिर्फ़ औरतों की नहीं, पूरे समाज की फ़िल्म
अक्सर मृत्युदंड को एक वुमन-ओरिएंटेड फ़िल्म कहा जाता है, लेकिन प्रकाश झा स्वयं मानते थे कि यह सिर्फ़ औरतों की कहानी नहीं है। यह उन पुरुषों के लिए भी है जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सवाल उठाने की हिम्मत रखते हैं। यह फ़िल्म उस चुप्पी को तोड़ती है, जो सदियों से औरतों पर थोप दी गई है—मानसिक, शारीरिक और सामाजिक अत्याचार सहते हुए भी खामोश रहने की मजबूरी।
फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि यह किसी आदर्श दुनिया की बात नहीं करती। यह गांव, पंचायत, राजनीति और सत्ता के गठजोड़ को बिना लाग-लपेट के सामने रखती है। प्रकाश झा का सिनेमा यही करता है—वह दर्शक को असहज करता है, ताकि वह सोचने पर मजबूर हो।
बिहार से बॉम्बे तक का सफ़र
27 फरवरी 1952 को बिहार के बेतिया ज़िले में जन्मे प्रकाश झा का फ़िल्मी दुनिया से कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था। वह एक किसान परिवार से आते थे, जहां भविष्य की तयशुदा योजना यही थी कि बेटा आर्मी स्कूल जाएगा और देश की सेवा करेगा। शुरुआती पढ़ाई भी उसी दिशा में हुई।
लेकिन आर्मी स्कूल के दिनों में ही उनका झुकाव परफॉर्मिंग आर्ट्स की तरफ़ होने लगा। यह झुकाव तब और गहरा हुआ जब तय हुआ कि वह नेशनल डिफेंस एकेडमी नहीं जाएंगे, बल्कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करेंगे और सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करेंगे।
दिल्ली में रहते हुए प्रकाश झा का सामना मंडी हाउस की थिएटर संस्कृति से हुआ। यहीं से उनके भीतर यह एहसास पनपा कि अभिनय और सिनेमा सिर्फ़ शौक़ नहीं, बल्कि जीवन का रास्ता भी बन सकते हैं।
FTII और डॉक्यूमेंट्री का दौर
1973 में प्रकाश झा ने पुणे स्थित फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII) में दाख़िला लिया। हालांकि, उस समय संस्थान में विवादों के कारण पढ़ाई बाधित थी। क्लासेज़ बंद थीं और छात्र असमंजस में थे।
इसी दौर में प्रकाश झा ने इंतज़ार करने के बजाय काम करना शुरू किया। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की और उन्हें स्टेट गवर्नमेंट्स व फ़िल्म डिविज़न तक पहुँचाया। मेहनत रंग लाई और उन्हें गोवा पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का मौका मिला।
यही वह मोड़ था, जहां उन्होंने तय किया कि औपचारिक डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है ज़मीनी अनुभव। जब FTII दोबारा खुला, तब तक प्रकाश झा अपने रास्ते पर आगे बढ़ चुके थे।
‘धर्मा’ की शूटिंग और जीवन का फ़ैसला
प्रकाश झा के जीवन में 1973 की फ़िल्म धर्मा की शूटिंग ने भी अहम भूमिका निभाई। मुंबई के सन एंड सैंड होटल में उन्होंने इस फ़िल्म की शूटिंग क़रीब से देखी—जहां रेखा, नवीन निश्चल और प्राण जैसे कलाकार काम कर रहे थे।
कई घंटों तक शूटिंग देखने के बाद उन्होंने उसी दिन तय कर लिया कि उन्हें फ़िल्में ही बनानी हैं। यही अनुभव आगे चलकर मृत्युदंड, गंगाजल, अपहरण और राजनीति जैसी फ़िल्मों की नींव बना।
आज भी प्रासंगिक है प्रकाश झा का सिनेमा
प्रकाश झा का सिनेमा समय के साथ पुराना नहीं पड़ता, क्योंकि जिन सवालों को वह उठाते हैं, वे आज भी हमारे सामने खड़े हैं—औरतों की आज़ादी, सत्ता का दुरुपयोग, सामाजिक ढोंग और नैतिक पाखंड।
मृत्युदंड आज भी इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि बराबरी सिर्फ़ क़ानूनों से नहीं आती, सोच बदलने से आती है। और यही काम प्रकाश झा का सिनेमा दशकों से करता आ रहा है।
उनके जन्मदिन के मौके पर यही कहा जा सकता है कि भारतीय सिनेमा को आईना दिखाने वाले इस फ़िल्मकार ने हमें सिर्फ़ फ़िल्में नहीं दीं, बल्कि सोचने की वजह भी दी।
