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पाँच लाख की फिल्म और सोच करोड़ों की: विजय आनंद उर्फ़ गोल्डी का सिनेमा दर्शन

  • February 24, 2026

हमने पाँच लाख में नौ दो ग्यारह बनाई थी और लगभग उतनी ही कमाई भी कर ली थी। हम सब बेहद खुश थे। आज के दौर में 25–30 करोड़ में फिल्म बनती है, और अगर वो 60 करोड़ भी कमा ले, तब जाकर पूँजी डबल होती है। लेकिन अब ऐसा हो नहीं पा रहा।”

ये शब्द थे हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार विजय आनंद के, जिन्हें दुनिया गोल्डी के नाम से जानती है। उन्होंने ये बातें कई साल पहले लहरें टीवी को दिए एक इंटरव्यू में कही थीं। आज उनकी पुण्यतिथि है। 2004 में आज ही के दिन भारतीय सिनेमा ने अपने सबसे सधे हुए कहानीकारों में से एक को खो दिया था।

गोल्डी साहब सिर्फ़ निर्देशक नहीं थे—वे निर्माता, लेखक और अभिनेता भी रहे। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्हें सिनेमा की नब्ज़ की गहरी समझ थी। उनके इंटरव्यू में कही गई बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं।

तब और अब के फिल्मी कारोबार का फर्क

विजय आनंद ने उस बातचीत में साफ़ कहा था कि उनके दौर में फिल्में व्यक्तिगत प्रोड्यूसर नहीं बनाते थे, बल्कि मजबूत बैनर्स हुआ करते थे।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा—

फिल्मिस्तान,

बॉम्बे टॉकीज़,

न्यू थिएटर्स,

प्रभात फ़िल्म कंपनी,

नव केतन,

आर.के. फ़िल्म्स,

बी.आर. फ़िल्म्स

उनका मानना था कि तब फिल्म इंडस्ट्री में एक स्थिरता थी। कलाकारों और तकनीशियनों को लगता था कि वे किसी संस्था का हिस्सा हैं। आज की तरह ऐसा नहीं है कि एक-एक फिल्म के लिए अलग ढांचा खड़ा किया जाए और फिर सब बिखर जाए।

गोल्डी की पहली स्क्रिप्ट और एक भाभी की भूमिका

उसी इंटरव्यू में विजय आनंद ने अपने जीवन का एक बेहद निजी और दिलचस्प किस्सा भी साझा किया था। उन्होंने बताया कि उन्होंने जो पहली फिल्म स्क्रिप्ट लिखी थी, वह उन्होंने अपनी भाभी उमा आनंद को सुनाई थी।

उन दिनों गोल्डी सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में पढ़ते थे और बीए कर रहे थे। कॉलेज में वे नाटक लिखा करते थे। जब उमा आनंद को यह बात पता चली, तो उन्होंने गोल्डी से कहा कि सिर्फ़ नाटक नहीं—फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिखकर देखो।

भाभी के कहने पर गोल्डी ने स्क्रिप्ट तो लिख दी, लेकिन उन्हें पूरा यकीन था कि इस पर कभी फिल्म नहीं बन पाएगी।

देव आनंद केंद्र में थे

जब उमा आनंद ने वह स्क्रिप्ट पढ़ी, तो उन्हें वह बेहद पसंद आई। खासतौर पर इसलिए क्योंकि वह स्क्रिप्ट गोल्डी ने अपने बड़े भाई देव आनंद को ध्यान में रखकर लिखी थी।

उमा आनंद ने कहा कि यह स्क्रिप्ट देव साहब को ज़रूर सुनानी चाहिए। गोल्डी ने कुछ झिझक के साथ अपने “देव पापा” को स्क्रिप्ट सुनाई। नतीजा वही हुआ—देव आनंद को कहानी बेहद पसंद आई।

इसके बाद स्क्रिप्ट गोल्डी के सबसे बड़े भाई चेतन आनंद तक पहुँची।

एक अनिश्चितता और ऐतिहासिक फैसला

गोल्डी को लग रहा था कि चेतन आनंद शायद इस स्क्रिप्ट को नकार देंगे, क्योंकि उनका सिनेमा हमेशा अलग सोच का रहा था। लेकिन जब चेतन आनंद ने स्क्रिप्ट सुनी, तो वे भी प्रभावित हुए।

आखिरकार यह तय हुआ कि इस कहानी पर फिल्म बनेगी। यही गोल्डी की लिखी पहली स्क्रिप्ट थी, जिस पर फिल्म बनी—

टैक्सी ड्राइवर

फिल्म के निर्देशक चेतन आनंद थे, हीरो देव आनंद और हीरोइन थीं कल्पना कार्तिक

सस्ती फिल्म, बड़ी सफलता

विजय आनंद ने बताया था कि टैक्सी ड्राइवर अपने समय के हिसाब से काफी सफल फिल्म रही, जबकि इसका बजट बेहद कम था। कैमरा घर का था, हीरो घर का था और हीरोइन भी घर की ही थी।

यही नहीं—इसी फिल्म के दौरान देव आनंद और कल्पना कार्तिक ने शादी भी कर ली थी।

एक दिलचस्प बोनस फैक्ट

फिल्म में देव आनंद जिस टैक्सी को चलाते दिखाई देते हैं, वह थी Chevrolet की Fleetmaster, जिसे 1946 में लॉन्च किया गया था।

यह छोटी-छोटी बातें ही टैक्सी ड्राइवर को आज भी यादगार बनाती हैं।

आज विजय आनंद जी की पुण्यतिथि पर, यह किस्सा याद दिलाता है कि सिनेमा सिर्फ़ बजट और आंकड़ों से नहीं बनता—वह सोच, ईमानदारी और समझ से बनता है।

गोल्डी साहब को किस्सा टीवी की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि।