
मालिश… तेल चंपीईईई!”
अचानक यह आवाज़ सुनकर गुरूदत्त ठिठक गए। उस समय वे मज़े से पुचका खा रहे थे। आवाज़ की दिशा में नज़र गई तो सामने एक चंपी वाला अपने अंदाज़ में ग्राहकों को बुला रहा था। वही एक मामूली-सी आवाज़ आगे चलकर हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे यादगार धुनों में से एक की वजह बनी।
दोस्तों, यह किस्सा जितना दिलचस्प है उतना ही ऐतिहासिक भी। वजह यह है कि आज ही के दिन, 22 फ़रवरी 1957 को प्यासा सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी। यानी आज से ठीक 69 साल पहले। यह कहानी उसी फिल्म और उसमें जॉनी वॉकर के अमर किरदार से जुड़ी है।
जब जॉनी वॉकर फिल्म का हिस्सा ही नहीं थे
बहुत कम लोग जानते हैं कि शुरुआत में प्यासा में न तो उस मशहूर गाने की कोई योजना थी और न ही जॉनी वॉकर को फिल्म में लेने का इरादा। गुरूदत्त चाहते थे कि “श्याम” का किरदार जॉनी वॉकर निभाएँ, लेकिन जल्दी ही उन्हें अहसास हुआ कि यह रोल जॉनी की कॉमिक इमेज से बिल्कुल उलट है। कहानी के एक मोड़ पर श्याम का चरित्र नकारात्मक हो जाता है, और दर्शकों के लिए जॉनी वॉकर को ऐसे रूप में स्वीकार करना आसान नहीं होता।
लेखक की आपत्ति और निर्देशक की ज़िद
गुरूदत्त ने फिल्म के लेखक अबरार अल्वी से कहा कि वे जॉनी वॉकर के लिए कोई अलग किरदार गढ़ें। लेकिन अबरार अल्वी ने साफ इंकार कर दिया। उनका तर्क था कि प्यासा बेहद गंभीर और भावनात्मक फिल्म है, जिसमें हास्य की कोई गुंजाइश नहीं।
मगर गुरूदत्त मानने वालों में से नहीं थे। कई दिनों तक यह बहस चलती रही। हालात यहां तक पहुँच गए कि एक दिन गुरूदत्त ने कह दिया—अगर जॉनी वॉकर फिल्म में नहीं होंगे, तो वे यह फिल्म ही नहीं बनाएँगे। जवाब में अबरार अल्वी ने भी दो टूक कह दिया कि वे कहानी को जबरदस्ती कॉमेडी के लिए बिगाड़ना नहीं चाहते। माहौल काफ़ी तनावपूर्ण हो गया।
कलकत्ता की वो दोपहर, जिसने इतिहास रच दिया
इसी दौरान फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में पूरी टीम कलकत्ता पहुँची। फुर्सत के एक दिन गुरूदत्त, जॉनी वॉकर और अबरार अल्वी होटल के सामने स्थित मशहूर विक्टोरिया गार्डन में टहलने पहुँचे। तय किया गया कि उस दिन काम की कोई चर्चा नहीं होगी—बस चाय, बातचीत और पुचकों का आनंद।
और तभी वह आवाज़ गूंजी—
“मालिश… तेल चंपीईईई!”
गुरूदत्त उस चंपी वाले को गौर से देखने लगे। कुछ पल बाद उन्होंने अबरार अल्वी से कहा—
“तुम कहते हो फिल्म बहुत भारी है। अगर दर्शकों को सांस लेने की जगह न मिली, तो फिल्म बोझिल लग सकती है। क्यों न बीच-बीच में आने वाला एक चंपी वाला हो, जो माहौल हल्का कर दे?”
जॉनी वॉकर और आवाज़ों का कमाल
यहाँ एक दिलचस्प तथ्य जानना ज़रूरी है। जॉनी वॉकर अभिनेता बनने से पहले बस कंडक्टर रह चुके थे, लेकिन उससे भी पहले वे मुंबई के माहिम इलाके में लगने वाले रात के मेले में साइकिल से घूम-घूमकर सामान बेचा करते थे। ग्राहकों को बुलाने के लिए वे तरह-तरह की आवाज़ें निकालते थे। गुरूदत्त यह बात जानते थे, इसलिए उन्होंने जॉनी से कहा कि उसी अंदाज़ में चंपी वाले की नकल करें।
आखिरकार अबरार अल्वी को यह विचार पसंद आ गया। उन्होंने “अब्दुल सत्तार” नाम का किरदार रचा और इसके लिए गीत लिखवाया साहिर लुधियानवी से। इस गीत को आवाज़ दी मोहम्मद रफ़ी ने।
गीत था—
“सर जो तेरा चकराए, या दिल डूबा जाए…”
जो आज भी जॉनी वॉकर की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।
विक्टोरिया गार्डन… जो असल में था ही नहीं
अक्सर लोगों को लगता है कि यह गाना सचमुच विक्टोरिया गार्डन में फिल्माया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि इसे बॉम्बे के एक स्टूडियो में शूट किया गया। प्यासा के आर्ट डायरेक्टर बीरेन नाग ने स्टूडियो में ऐसा सेट तैयार किया कि कलकत्ता का असली माहौल महसूस हो। स्ट्रीट लाइट, बेंच, फेंसिंग—हर चीज़ पर बारीकी से काम किया गया।
यह किस्सा हमें कैसे पता चला?
इस पूरी कहानी का ज़िक्र जॉनी वॉकर साहब के बेटे, अभिनेता नासिर खान ने अपने एक यूट्यूब वीडियो में किया है। उसी के ज़रिये यह दिलचस्प किस्सा सामने आया।
तो अगली बार जब भी आप “सर जो तेरा चकराए” सुनें, इस कहानी को ज़रूर याद कीजिएगा। हो सकता है, तभी उस गाने का मज़ा और भी बढ़ जाए।
