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जीवनधारा (1982): एक औरत, जो अपने सपनों से पहले परिवार को चुनती है

  • February 19, 2026

जीवनधारा (1982): एक औरत, जो अपने सपनों से पहले परिवार को चुनती है

संगीता कोई साधारण फ़िल्मी नायिका नहीं है। वह ग्लैमर, रोमांस या बड़े सपनों की दुनिया से नहीं आती। वह आती है ज़िम्मेदारियों से भरे एक छोटे से घर से, जहाँ हर चेहरा उसी पर निर्भर है। जीवनधारा सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि उस स्त्री की कहानी है जो अपने लिए जीने से पहले सबके लिए जीती है।

कहानी: जब ज़िम्मेदारी सपनों से बड़ी हो जाती है

संगीता एक आत्मनिर्भर, मज़बूत और सिद्धांतों पर चलने वाली युवती है। उसका परिवार बड़ा है, लेकिन कमाने वाला कोई और नहीं। पिता परिवार छोड़ चुके हैं, माँ बीमार रहती है, एक भाई बेरोज़गार और शराब की लत में डूबा हुआ है, एक बहन विधवा है और बाकी भाई-बहन पढ़ाई कर रहे हैं।

घर छोटा है, लेकिन बोझ बहुत बड़ा।

संगीता किसी से शिकायत नहीं करती, मगर उसके मन में भी कहीं न कहीं यह चाह ज़रूर पलती है कि उसकी भी शादी हो, उसका भी एक अपना परिवार हो। उसी दौरान उसकी ज़िंदगी में प्रेम आता है। प्रेम उसका अच्छा दोस्त है और धीरे-धीरे दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता बन जाता है।

त्याग का सबसे कठिन फ़ैसला

कहानी तब करवट लेती है जब संगीता को पता चलता है कि उसकी विधवा बहन भी प्रेम को चाहने लगी है। सच जानने के बाद संगीता टूटती है, लेकिन अपने दर्द को दबाकर वह प्रेम से कहती है कि वह उसकी बहन से शादी कर ले।

यह फ़ैसला किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि उस त्याग से लिया गया है जो सिर्फ़ बहुत मज़बूत लोग कर पाते हैं।

नई उम्मीद और फिर एक और बलिदान

संगीता की ज़िंदगी में दूसरी बार उम्मीद आती है उसके बॉस कंवल के रूप में, जो न सिर्फ़ उसके भाई को नौकरी दिलवाता है बल्कि संगीता को विवाह का प्रस्ताव भी देता है। संगीता इस बार अपने लिए सोचती है और शादी के लिए हाँ कह देती है।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है। शादी वाले दिन ही संगीता के भाई की हत्या हो जाती है। यह हादसा उसकी पूरी दुनिया हिला देता है। एक बार फिर वह अपने सपनों को पीछे छोड़कर परिवार की ज़िम्मेदारी उठाने का निर्णय लेती है और शादी तोड़ देती है।

फ़िल्म का अंतिम संवाद: आत्मा को झकझोर देने वाला सच

फ़िल्म के अंत में संगीता बस कंडक्टर से कहती है —

“जिस औरत पर माँ, विधवा बहन, भाई-बहन और बच्चों की ज़िम्मेदारी हो, वो अपने लिए सपने देखने की इजाज़त नहीं रखती।”

और यहीं जीवनधारा खत्म हो जाती है — बिना किसी सुखांत के, लेकिन बहुत गहरे असर के साथ।

फ़िल्म से जुड़े रोचक तथ्य

जीवनधारा 19 फरवरी 1982 को रिलीज़ हुई थी मुख्य भूमिका में थीं रेखा पुरुष कलाकारों में अमोल पालेकर, राज बब्बर और राकेश रोशन शामिल थे निर्देशन किया था टी. रामाराव ने कहानी थी के. बालाचंदर की संवाद लिखे थे राही मासूम रज़ा ने संगीत दिया था लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने गीतकार थे आनंद बक्शी

रीमेक और सिनेमा इतिहास

जीवनधारा मूल रूप से तमिल फ़िल्म Aval Oru Thodar Kathai का हिंदी रूपांतरण थी। यही कहानी तेलुगू, बंगाली और कन्नड़ भाषाओं में भी बनी, जिनमें ज़्यादातर संस्करणों में कमल हासन ने अभिनय किया।

साल 2024 में अपनी किताब Viewfinder में अमोल पालेकर ने लिखा कि यह फ़िल्म विचारधारा के स्तर पर ऋत्विक घटक की मेघे ढाका तारा से प्रेरित थी।

क्यों आज भी प्रासंगिक है जीवनधारा

आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, जीवनधारा हमें यह भी दिखाती है कि कई औरतें मज़बूत होने के बावजूद अपने सपनों को इसलिए छोड़ देती हैं क्योंकि समाज उन्हें विकल्प नहीं देता।

यह फ़िल्म किसी नारे की तरह नहीं बोलती, बल्कि चुपचाप एक कड़वा सच हमारे सामने रख देती है।

निष्कर्ष

जीवनधारा उन फ़िल्मों में से है जो देखने के बाद तालियाँ नहीं, बल्कि ख़ामोशी छोड़ जाती हैं।

यह रेखा के करियर की सबसे संवेदनशील भूमिकाओं में से एक है और हिंदी सिनेमा की उन क्लासिक फ़िल्मों में शामिल है, जो समय के साथ और भी प्रासंगिक होती चली गईं।