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किस्सा पूरब और पश्चिम फ़िल्म का।

  • February 19, 2026

“जब मैं लाहौर से दिल्ली आया तो मुझे लाहौर की याद आती थी। जब दिल्ली से मुंबई आया तो दिल्ली मुझे बहुत याद आता था। वो लोग जो पढ़ाई करने विदेश जाते हैं और फिर वहीं बस जाते हैं, उन्हें भी अपने देश की याद आती ही होगी। ये विचार मेरे मन में था। एक दिन मेरी पत्नी शशि ने मुझे इस थॉट पर एक फ़िल्म बनाने का आईडिया दिया।” साथियों ये बात कई साल पहले स्वर्गीय मनोज कुमार जी ने एक इंटरव्यू में कही थी। फिर जब मनोज कुमार जी ने उस थॉट पर वाकई में काम किया। यानि एक फ़िल्म बनाई, तो उस फ़िल्म की स्टोरी का क्रेडिट उन्होंने अपनी पत्नी शशि गोस्वामी जी को ही दिया। वो फ़िल्म थी पूरब और पश्चिम।

आज पूरब और पश्चिम फ़िल्म के 56 साल पूरे हो गए हैं। 19 फरवरी 1970 के दिन पूरब और पश्चिम फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। बहुत प्यारी फ़िल्म है। चलिए इस फ़िल्म की मेकिंग से जुड़ी कुछ और रोचक कहानियां जानते हैं। आपको ये कहानियां ज़रूर पसंद आएंगी। लाइक-शेयर करना मत भूलिएगा। ताकि ऐसी कहानियां आपको आगे भी पढ़ने को मिलती रहें।

किसी फ़िल्म में ‘इंट्रोड्यूज़िंग’ लिखा है किसी कलाकार के लिए। लेकिन मनोज कुमार जी ने पूरब और पश्चिम फ़िल्म में ‘इंट्रोड्यूज़िंग लिखा गीतकार संतोष आनंद जी के लिए लिखा था। बतौर फ़िल्मी गीतकार पूरब और पश्चिम संतोष आनंद जी की पहली फ़िल्म थी। दिल्ली में हुए एक कवि सम्मेलन में मनोज कुमार ने संतोष आनंद को पहली बार देखा-सुना था। संतोष आनंद जी की कविताओं से मनोज कुमार बहुत प्रभावित हुए थे। और उन्होंने संतोष आनंद को अपनी फ़िल्म के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया, जिसे संतोष आनंद ने स्वीकार भी कर लिया। संतोष आनंद जी ने पूरब और पश्चिम फ़िल्म के लिए जो गीत लिखा था उसके बोल थे ‘पुरवा सुहानी आई रे।’ फ़िल्म के अन्य गीतकार थे इन्दीवर और प्रेम धवन।

पूरब और पश्चिम फ़िल्म का नाम मनोज कुमार जी पहले हरे रामा हरे कृष्णा रखना चाहते थे। इस नाम को मनोज कुमार रजिस्टर भी करा चुके थे। मगर बाद में मनोज कुमार जी को अपनी फ़िल्म के लिए ये टाइटल सही नहीं लगा। दूसरी तरफ़ देव आनंद साहब भी अपनी एक फ़िल्म का नाम हरे रामा हरे कृष्णा रखना चाहते थे। जब देव साहब को पता चला कि ये टाइटल तो मनोज कुमार जी ने पहले ही रजिस्टर करा लिया है, तो देव साहब ने मनोज जी से बात की। उन्होंने मनोज जी से ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ टाइटल देने की रिक्वेस्ट की, जिसे मनोज कुमार ने बहुत प्यार से स्वीकार भी कर लिया।

बात जब पूरब और पश्चिम फ़िल्म की हीरोइन की आई तो मनोज कुमार जी को लगा कि सायरा बानो ही हीरोइन का रोल निभा सकती हैं। क्योंकि जिस तरह की खूबसूरत और ग्लैमरस लड़की की तलाश मनोज जी को थी वैसी सिर्फ़ सायरा बानो ही उस वक्त फ़िल्म इंडस्ट्री में थी। एक दिन मनोज कुमार सायरा बानो से पूरब और पश्चिम फ़िल्म में काम करने की बात करने उनके घर पहुंचे। पहले उनकी मुलाक़ात दिलीप कुमार से हुई। दिलीप साहब को लगा कि मनोज कुमार उनके पास किसी फ़िल्म में काम करने का ऑफ़र लेकर आए हैं।

मनोज कुमार जो जब इस बात का अंदाज़ा हुआ कि दिलीप कुमार क्या सोच रहे हैं तो उन्होंने काफ़ी शरमाते हुए दिलीप साहब से कहा कि फिलहाल तो मैं सायरा जी को साइन करने आया हूं। लेकिन एक दिन आपको साइन करने भी मैं ज़रूर आऊंगा। ये सुनकर दिलीप कुमार ने सायरा बानो को आवाज़ लगाई। और वहां से उठकर अपने बैडरूम में चले गए। सालों बाद जब एक बार फिर से मनोज कुमार दिलीप साहब के घर पहुंचे तो दिलीप साहब ने उनसे कहा,”क्या आज भी तुम सायरा को ही साइन करने आए हो?” जवाब में मनोज जी ने कहा,”आज तो मैं आपको साइन करने आया हूं।” उस दिन मनोज कुमार ने दिलीप कुमार को क्रांति फ़िल्म के लिए साइन किया था।

मनोज कुमार जी को हवाई यात्रा से बड़ी एलर्जी थी। शुरुआत में जब उन्होंने दो-चार बार हवाई यात्रा की थी तब उनकी तबियत खराब हो जाती थी। लैंडिंग के बाद उन्हें तेज़ बुखार और चेहरे पर फुंसी-फोड़ों की शिकायत होती थी। इस वजह से उन्होंने हवाई जहाज़ में सफ़र करना बंद कर दिया था। पूरब और पश्चिम फ़िल्म की काफ़ी शूटिंग इंग्लैंड में हुई थी। मनोज कुमार जी एक महीने पहले बाय शिप इंग्लैंड के लिए निकल गए थे। बाकी यूनिट बाय एयर लंदन पहुंची थी। वो भी मनोज कुमार जी के एक महीने बाद। बताया जाता है कि पूरब और पश्चिम फ़िल्म की शूटिंग के लिए एक बार मनोज कुमार जी को भी हवाई यात्रा करनी पड़ गई थी। और तब मनोज जी को उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा था जिनकी वजह से वो हवाई यात्रा करने से बचते थे।

पूरब और पश्चिम फ़िल्म में मनोज कुमार के असिस्टेंड डायरेक्टर थे चंद्रा बरोट। चंद्रा बरोट जिस उत्साह और लगन से काम करते थे वो मनोज जी को बहुत पसंद था। मनोज जी चंद्रा बरोट से इतने खुश थे कि उन्होंने अपनी अगली फ़िल्म डायरेक्ट करने का ज़िम्मा चंद्रा बरोट को ही दे दिया। वो फ़िल्म थी रोटी कपड़ा और मकान। मगर जब डिस्ट्रीब्यूटर्स को जब ये बात पता चली तो उन्होंने मनोज कुमार पर दबाव डाला कि आप अपने असिस्टेंट से फ़िल्म ना डायरेक्ट कराएं। खुद करें। नहीं तो फ़िल्म के बिजनेस पर बुरा असर पड़ेगा। क्योंकि आपकी फ़िल्म आपके नाम से सेल होती है। आखिरकार मनोज जी ने ‘रोटी कपड़ा और मकान’ फ़िल्म को खुद ही डायरेक्ट किया। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ फ़िल्म के दौरान ही डॉन फ़िल्म की नींव पड़ी थी जो साल 1978 में आई थी और बहुत बड़ी हिट साबित हुई थी। डॉन का डायरेक्शन मनोज कुमार जी के असिस्टेंट चंद्रा बरोट ने ही किया था।

पूरब और पश्चिम फ़िल्म का मशहूर गीत ‘भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।’ कहानी के मुताबिक़ लंदन में है। लंदन के एक रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट में मनोज कुमार ये गीत गाते हैं। ये सीन वास्तव में मुंबई में ही शूट हुआ था। महबूब स्टूडियो में रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट का सेट लगाया गया था। और वो सेट ऑटोमेटिक नहीं घूम रहा था। उसे मैनुअली घुमाया जा रहा था। और साथियों ये तो आपने भी देखा होगा कि मनोज कुमार जी ने कितनी खूबसूरती से उस गाने को पिक्चराइज़ किया था। एक-एक शॉट और कैमरा फ्रेम, व लाइटिंग्स कमाल की हैं उस गीत में।

इस फ़िल्म में मनोज कुमार जी की क्रिएटिविटी का एक नमूना कुछ यूं है कि फ़िल्म की शुरुआत में हमें दिखता है कि भारत अंग्रेजों की गुलामी में कैद है। और कुछ क्रांतिकारी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मनोज कुमार जी ने ये पूरा सीक्वेंस ब्लैक एंड व्हाइट रखा था। लगभग साढ़े 17 मिनट के बाद देश के आज़ाद होने का दृश्य आता है। तब फ़िल्म के नाम का एक हिस्सा ‘पूरब’ दर्शकों को नज़र आता है। यहां से फ़िल्म रंगीन भी हो जाती है। फिर जब 35 मिनट बाद मनोज कुमार विदेश जाकर एक लडकी(सायरा बानो) को सिगरेट पीता देखते हैं वहां स्क्रीन पर नज़र आता है ‘और पश्चिम।’ और उस सीन में पश्चिमी संस्कृति की एक झलक पश्चिमी म्यूज़िक के साथ दिखाई जाती है।

नामी फ़िल्म आलोचक दीपा गहलोत ने अपने एक आर्टिकल में पूरब और पश्चिम फ़िल्म के बारे में लिखा है कि पूरब और पश्चिम को आज़ादी से जोड़कर देखा जाए तो पता चलता है कि मनोज कुमार ये मैसेज देना चाहते हैं कि सिर्फ़ अंग्रेजी शासन से आज़ाद होना ही काफ़ी नहीं है। हम लोगों को अपने भारतीय होने पर भी गर्व करना चाहिए। दीपा गहलोत का ये कमेंट पूरब और पश्चिम फ़िल्म की विशिष्टता साबित करता है।

दीपा गहलोत जी ने ये भी लिखा था कि जिस दौर में मनोज कुमार लंदन में पूरब और पश्चिम फ़िल्म की शूटिंग करने गए थे तब हिप्पी कल्चर अपने शिखर पर था। मनोज जी ने लंदन की दुनिया की खूबसूरती और बदसूरती एक ही फ़िल्म में दिखा दी। बहुत आसानी से मनोज कुमार जी ने दिखाया कि पश्चिम में वासना, करप्शन और लालच है। जबकी भारत में प्रेम, दया व दूसरों के प्रति सम्मान है।

बकौल दीपा गहलोत, आगे भी कई फ़िल्मों में इस आईडिया पर काम किया गया। जैसे की डीडीएलजे। डीडीएलजे का हीरो भी विदेश में रहता है। मगर लड़की को टच भी नहीं करता है। और वो शादी भी लड़की से तब ही करना चाहता है जब उसके माता-पिता की मर्ज़ी हो। बहुत लोग मानते हैं कि नमस्ते लंदन पर तो पूरब और पश्चिम का साफ़ असर है। नमस्ते लंदन के एक सीन में में अक्षय कुमार पूरब और पश्चिम फ़िल्म का ज़िक्र करते भी दिखाई देते हैं। हालांकि नमस्ते लंदन फ़िल्म के डायरेक्टर विपुल अमृतलाल शाह इस बात को खारिज करते हैं। उन्होंने कहा था कि उनकी कहानी एक रियल लाइफ़ इन्सीडेंट से प्रेरित थी। और वो इन्सीडेंट अक्षय कुमार के एक दोस्त के साथ हुआ था। अक्षय ने भी इस बात की तस्दीककी थी।

पूरब और पश्चिम के ज़रिए मनोज कुमार जी ने संदेश दिया कि आप दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना चले जाएं। कितना भी क्यों ना पढ़ लिख जाएं। मगर अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने देश को कभी ना भूलें।

कहा जाता है कि पूरब और पश्चिम इतनी प्रभावी फ़िल्म थी कि विदेश में रह रहे कुछ भारतवंशी तो ये फ़िल्म देखकर वापस भारत लौट आए थे। इस फ़िल्म ने उन भारतवंशियों के मन में दबी भारतीयता की भावना को इस कदर बाहर निकाला कि उन लोगों को अपने वतन वापस आना ही पड़ा। उन लोगों को अपने ही वतन में सुकून मिला। ये भी बताया जाता है कि उस वक्त कई लोगों ने तो मनोज कुमार जी को चिट्ठी लिखकर ये बात बताई थी कि पूरब और पश्चिम वो विदेश से वापस भारत लौट आए हैं।

पूरब और पश्चिम में आरतियां भी हैं। जैसे ओम जय जगदीश हरे, हरे रामा हरे कृष्णा व रघुपति राघव राजा राम। कई लोगों ने तब ऐसा कहा था कि अगर आप पूरब और पश्चिम फ़िल्म सिनेमाघर में देखते हैं तो लगता है जैसे किसी मंदिर में आप पहुंच गए हैं। उस वक्त के कुछ अखबारों में भी ऐसी बातें प्रकाशित हुई थी। साल 1971 में पूरब और पश्चिम फ़िल्म को इंग्लैंड में रिलीज़ किया गया था। और लंदन में इस फ़िल्म ने पचास हफ़्ते तक चलने का रिकॉर्ड बनाया था। ये रिकॉर्ड पहले राजेश खन्ना-मुमताज़ स्टारर ‘दो रास्ते’ फ़िल्म के नाम था। पूरब और पश्चिम ने यूके में सर्वाधिक कमाई करने का ‘दो रास्ते’ का रिकॉर्ड तोड़ा था। बाद में साल 1994 में आई सलमान-माधुरी की ‘हम आपके हैं कौन’ ने पूरब और पश्चिम का ये रिकॉर्ड तोड़ा था।

साल 1970 की टॉप फ़िल्मों में पूरब और पश्चिम चौथे स्थान पर रही थी। पहले नंबर पर थी जॉनी मेरा नाम। दूसरे स्थान पर सच्चा-झूठा। और तीसरे पायदान पर आन मिलो सजना फ़िल्म थी। पूरब और पश्चिम का एग्ज़ैक्ट बजट एंड बॉक्स ऑफ़िस कलैक्शन कितना था, ये तो हमें नहीं पता चल सका। लेकिन एक जगह हमने पढ़ा कि इस फ़िल्म का इंडिया नेट कलैक्शन 2 करोड़ 25 लाख रुपए था।

पूरब और पश्चिम बतौर प्रोड्यूसर मनोज कुमार की पहली फ़िल्म भी थी। इस फ़िल्म को उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस विशाल इंटरनेशनल प्रोडक्शन्स के अंडर बनाया था। अपने प्रोडक्शन हाउस का नाम उन्होंने अपने बेटे विशाल के नाम पर रखा था।

पूरब और पश्चिम के संगीतकार थे कल्याणजी-आनंदजी। इस जोड़ी ने एक गाना पूरब और पश्चिम फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड किया था जिसके बोल थे ‘चलो भाग चलें पूरब की ओर।’ मगर किन्हीं वजहों से पूरब और पश्चिम फ़िल्म में वो गाना इस्तेमाल नहीं हो सका। फिर साल 1987 में ‘कलयुग और रामायण’ फ़िल्म में ये गाना इस्तेमाल किया गया था।उस फ़िल्म के हीरो व प्रोड्यूसर भी मनोज कुमार ही थे।

पूरब और पश्चिम में दो बेहद पुराने गीतों का भी इस्तेमाल किया गया है। एक सीन में रिकॉर्ड पर मदन पुरी इन गीतों को प्ले करते हैं। पहला है ‘बाबा, मन की आंखें खोल’ जो साल 1935 में आई धूप छांव नामक फ़िल्म का गीत है। इस गीत को के.सी. डे जी ने आवाज़ दी थी। ऑरिजिनली ये गीत उन्हीं पर पिक्चराइज़ भी हुआ था। दूसरा गीत है ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए।’ ये गीत साल 1938 की फ़िल्म स्ट्रीट सिंगर का है। इसे के.एल. सहगल साहब ने गाया था। मनोज कुमार जी ने इन दोनों गीतों को पूरब और पश्चिम के ओपनिंग क्रेडिट्स में मेंशन किया है। और HMV व दिलीप सिरकार को धन्यवाद दिया था।

पिछले साल 14 नवंबर को जब कामिनी कौशल जी की मृत्यु हुई थी तब सायरा बानो जी ने उन्हें याद करते हुए पूरब और पश्चिम फ़िल्म से जुड़ा एक रोचक किस्सा बताया था। कामिनी कौशल जी ने मनोज कुमार की मां का किरदार निभाया था पूरब और पश्चिम में। कामिनी जी की मृत्यु के बाद सायरा जी ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने बताया था कि फ़िल्म में नाग पंचमी का एक दृश्य है। प्रीति, जो पश्चिमी संस्कृति में पली-बढ़ी है, वो मंदिर जाती है। मंदिर में दो अन्य महिलाएं भी हैं जो पूजा कर रही हैं।

मंदिर में प्रीति को एक नाग नज़र आता है। वो औरतें उसी नाग की पूजा कर रही हैं, जिसे देखकर वो बहुत हैरान होती है। मगर तभी सांप उसकी तरफ़ फुफकारता है। जिससे प्रीति डर जाती है और भागने लगती है। चूंकि इस फ़िल्म में सायरा जी का किरदार एक वेस्टर्नाइज़्ड इंडियन गर्ल का है, तो उन्होंने उस सीन में भी वेस्टर्न कपड़े और हाई हील्स पहनी हुई थी। मगर चूंकि उस सीन में सायरा जी को एक कीचड़ भरे रास्ते पर भागना था, तो मनोज कुमार ने उनसे पूछा कि वो इन ऊंची-ऊंची हील्स वाले जूतों में इस रास्ते पर कैसे भागेंगी?

तब कामिनी कौशल जी, जो उस वक्त वहीं मौजूद थी, उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने फ्लैट जूते सायरा बानो की तरफ़ बढ़ाए और कहा,”ये पहन लो। ज़्यादा आसान रहेगा।” सायरा बानो को पहले तो लगा कि पता नहीं कामिनी जी के जूते उन्हें फिट आएंगे भी कि नहीं? मगर जब सायरा बानो ने कामिनी जी के वो जूते पहने तो सायरा बहुत हैरान हुई। कामिनी कौशल के जूते उनके पैरों में एकदम फिट आए। और फिर बहुत आसानी से सायरा बानो ने वो सीन कंप्लीट कर लिया। बाद में सायरा बानो और कामिनी कौशल खूब हंसे उस सीन के बारे में बात करके।

साथियों ये लेख यहां खत्म होता है। कहीं कोई भाषा या शब्द की गलती दिखे तो सूचित कीजिएगा। और हां, यहां तक पढ़ लिया है अगर आपने ये लेख तो आपको सैल्यूट। बिग सैल्यूट। #purabaurpaschim1970 #56yearsofpurabaurpaschim #ManojKumar #SairaBanu #PurabAurPaschim #KaminiKaushal